लद्दाख में चीनी की कम हुए
लद्दाख में ऑपरेशन स्नो लेपर्ड का पहला फेज पूरा हो गया है पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी छोर से भारत चीन की सेनाओं की वापसी की पुष्टि हो चुकी है । यह फेज सबसे अहम था, क्योंकि यहां से प्वाइंटर्स थे जहां दोनों सेनाएं आमने सामने खड़ी थी इसलिए स्थिति कभी भी युद्ध में बदल सकती थी । यानी,अब हम कह सकते हैं कि जंग की नौबत टल गई है। भारत के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि हमने अपनी शर्तों पर चीनी सेनाओं को वापस भेजा है। यह पहली बार हुआ है जब चीन ने लिखित में सेना वापसी का शर्तें मानी है ।उसने पहले बख्तरबंद वाहनों, तोपों और टैंकों को को हटाया, फिर दोनों सेनाएं उत्तरी और दक्षिणी छोर से पीछे हटी ।आखिर में हमारी सेना कैलाश रेंज से पीछे हटी। अब शनिवार को दोनों सेनाओं के कमांडर फिर बैठक करेंगे । इसमें देपसांग ,गोगरा और हॉट स्प्रिंग के पेट्रोलियम पॉइंट पर बात होगी ।
दरअसल ,पिछले 10 महीने में हमने चीन को यह जता दिया है कि समझौता के अलावा कोई रास्ता नहीं है एलएसी पर यथास्थिति की उसकी मानसा नाकाम रही थी ।आशंका जाहिर की जा रही है कि कैलाश रेंज से हमारी सेना हटाने के बाद चीन का रुख बदल सकता है। लेकिन यह दावे के साथ कह सकता हूं कि दक्षिण पैंगोंग में हम मजबूत स्थिति में हैं। कैलाश रेंज से वापस आने का मतलब यह कतई नहीं कि हम दोबारा वहां नहीं पहुंच सकते अगर चीन कुछ गड़बड़ करता है तो हमारी सेना वहां 3 घंटे में पहुंच सकती है जबकि चीनी सेना को वहां से पहले की स्थिति में आने में 12 घंटे लगेंगे चीन को पीछे धकेलने में सफल होने के बाद हम पहली बार 1962 की पराजित मानसिकता से बाहर आए हैं।।


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